बुधवार, 19 जून 2013 | By: kamlesh chander verma

''माँ '' के जाने के बाद ''

टूटी साँस ,टूटी गांठ ,  लड़ी खुलकर  बिखर गयी,
रिश्तों की  ज़ंजीर की ,कड़ी खुलकर   बिखर गयी।

वो क्या गयी !आसमां के भी रूप- रंग बदल गए ,
आँगन की चिड़ियों के ,खुद भी  स्वरुप बदल गये।

हर इक  को फिकर थी  'उसके' घर के घोंसले की ,
नही!नही! सबको जल्दी थी ,उसको ''नोचने'' की।

न किसी के दिल में  शोक,  न अवसाद ,भरा था ,
''क्या मिलेगा मुझको' मनों में यह मवाद भरा था।

जो मंजर नजर आया ,भविष्य सबका   दिख गया ,
इतिहास दोहराएगा ? वक्त ये मन पर लिख गया। 

''कमलेश' उसने मुश्किल से पाला, इन फरिश्तों[कहने में क्या हर्ज़ है] को ,
क्यों नही समझ  सकी  दुनिया ''उस'' गरीब के रिश्तों को।।''


2 comments:

Ravinder verma ने कहा…

इतिहास दोहराएगा ? .....

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

उफ़...दुखद ..माँ और बेटे के रिश्ते से ऊपर कुछ नहीं ...आज भी

ये मैं अच्छे से समझ सकती हूँ