शनिवार, 6 अक्तूबर 2012 | By: kamlesh chander verma

कैसे कहूँ ! वो तुम्हारी बातें....!!!

कैसे कहूँ !  वो तुम्हारी बातें ,  जो एक राज हैं ,
कल भी वो ही  बातें  थी ,    जो बात आज है। 

उलझी लटों की उलझनों को, सुलझाता रह गया ,
सुनहरा था जो वक्त वह उलझनों में में बह गया। 

तेरी आरज़ू ने हमें तडफाया है,  दिन रात  मगर ,
तड़फ भी गंवारा थी  मुझे , तुम मिल जाती अगर। 

हाय !मेरी बद्किश्मती , मिली तन्हाई  रूश्वाई। 
यह भी सह जाता दिल खुद , गर होती न जुदाई.

फिर भी दफन हैं तेरे राज , इस दिल के साथ में ,
अब दे जिंदगी या मौत 'कमलेश' ,है ये तेरे हाथ में।।