रविवार, 27 दिसंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

जिन्दगी को गर जिए...!!!

जिन्दगी को गर जिए जिन्दगी ,ये कोई कम नही
जिन्दगी को भी मिले जिन्दगी, तो कोई गम नही

जिन्दगी से जब खुद बिछुड़े जिन्दगी ,तो हो आँख नम नही
जिन्दगी बिछूड कर कहाँ जाएगी तू ,बैठे रहेंगे इंतजार में हम यहीं

जिन्दगी कहते थे ,बहुत खूबसूरत है ,देखा तो अब कोई भ्रम नही
जिन्दगी ''कमलेश'' कि दोस्त है, जिन्दगी है तो ,'हैं 'नही तो हम नही

6 comments:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत ही बढ़िया रचना ... बधाई.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत खूब!

M VERMA ने कहा…

जिन्दगी को गर जिए जिन्दगी'
जी हाँ! कभी कभी जिन्दगी बिना जिन्दगी के भी होती है.

Suman ने कहा…

nice.....................................................nice...................................................................................nice...............................................................................................................................suman

अजय कुमार ने कहा…

उम्दा कहा

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

जिन्दगी को गर जिए जिन्दगी ,ये कोई कम नही ।
जिन्दगी को न भी मिले जिन्दगी, तो कोई गम नही ।

बहुत खूब .....!!