मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012 | By: kamlesh chander verma

जिन्दगी के सफर में ऐसा....!!!

जिन्दगी के सफर में ऐसा मुकाम आया है,
जिन्दगी ने खोया ही है न कुछ पाया है। 

हैरान हैं फिजायें वक्त का  मंजर देख कर,

हैरान हैं हम हवाओं के बदले तेवर देख कर। 

ज़रूर होती है सुबह हर ढलती शाम की ,

गर हो न सुहानी तो फिर किस काम  की। 

जहाँ गूंजती थी हवाओं की मदमस्त सरगोशियाँ ,

क्यों सिसकती हैं फिजाओं  में ये  खामोशियाँ  .

अब तक  न उनका कोई इजहारे  पयाम आया है ,

 कमलेश 'जिन्दगी ने खोया ही है न कुछ पाया है।