रविवार, 9 मई 2010 | By: kamlesh chander verma

इक-इक कतरे का हिसाब चाहिए ...!!!


अपने लहू के इक - कतरे का हिसाब चाहिए !
फंदे पर लटकते 'अफज़ल'और'कसाब'चाहिए!

जिनका बहा है खून जरा ,उनके दिल से पूछिए ,
जो देखा था आँखों ने वो , सुंदर सा ख्वाब चाहिए !

कितनी गैरत बाकि है इस देश में ,गैरों के लिये ,
क्यों ? ये मेहमान नवाजी इनकी .जवाब चाहिए !

जिंदगियोंमें जो अँधेरा किया, इन जालिमों ने ,
इनमे रोशनी भरने को, हजारों महताब चाहिए !

इनकी जड़ों को काट दो ,जहाँ से ये निकलती है ,
उन शहीदों की आत्माओं को, भी इंसाफ चाहिए !

दिल रोता है देख कर अपने, देश के कानूनों को ,
आतंकियों के लिये कानून बिलकुल सख्त और साफ चाहिए !

'
कमलेश 'क्या हो गया है इस देश के कर्णधारों को ,
हमे वोटों और लाशों की गिनती का इनसे हिसाब चाहिए !!

6 comments:

HTF ने कहा…

फंदे पर लटकते 'अजमल 'और 'कसाब'चाहिए!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत बढ़िया जोश भरी रचना है ! अब तो बिलकुल देश की जनता को हिसाब चाहिए ...

Mithilesh dubey ने कहा…

सही लिखा है आपने , अजमल और कसाब चाहिए ।

दिलीप ने कहा…

aankh kholne aur jhakkhorne wali rachna...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकीरचना बहुत सामयिक है!

मातृ-दिवस पर
ममतामयी माँ को प्रणाम तथा कोटि-कोटि नमन!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

सामयिकता से लबरेज रचना, मन को छू गयी, बधाई।
कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?