बुधवार, 11 नवंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

तुम भी वही निकले ...!!!

तुम भी वही निकले ,जिसका गुमान था ,


इक बार फ़िर दिल ने देना इम्तिहान था ॥


पहले भी टूटी थी बिजलियाँ ,इस मुकाम पर ,


उनका गवाह नीचे जमीं ,ऊपर असमान था ।


शक भी जरा सा होता ,तो कुछ सोचते हम ,


पर क्या पता ?पहले से दिल बे -इमान था ।

लुट गया कारवां ,मंजिल से पहले मेरा ,

उसके हाथों लुटा जो ,निगेहबान था ।

''कमलेश'' शायद फ़िर कोई आएगा कहीं ,

जो प्यार का असली कद्रदान था

3 comments:

M VERMA ने कहा…

लुट गया कारवां ,मंजिल से पहले मेरा ,
उसके हाथों लुटा जो ,निगेहबान था ।
बहुत ही खूबसूरत भाव, विरोधाभाषी तेवर और यथार्थपरक रचना

संजय भास्कर ने कहा…

तुम भी वही निकले ,जिसका गुमान था ,


इक बार फ़िर दिल ने देना इम्तिहान था ॥


पहले भी टूटी थी बिजलियाँ ,इस मुकाम पर ,


उनका गवाह नीचे जमीं ,ऊपर असमान था ।
LAJWAAB

Suman ने कहा…

nice