मंगलवार, 10 नवंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

जिन्दगी क्यों बनी..???

जिन्दगी क्यों बनी,दुश्मन जिन्दगी की ,

उसी ने दी बददुवा , जिसकी बंदगी की


काश ; समझ पाते फितरत उसकी ,

लिख लेते इबारत चेहरे पर, पसंदगी की


था अकेला तो भी खुश था ,

किसी ने दे दी कसम, पूरी जिंदगी की


जीते जी मर गये ''कमलेश '' हम तभी ,

जब निकली कातिल जिन्दगी, ख़ुद जिन्दगी की

2 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया है, बधाई.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

अरे वाह, आपने जिंदगी को बहुत सुंदर ढंग से बयां किया है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }