शनिवार, 18 नवंबर 2017 | By: kamlesh chander verma

माँ बाप।।

जो थे रोशन  चिराग कभी घर के,
कैसे देहरी के बुझे दिये हो गये।
जिनके बिना सभी रचनाएं थी अधूरे ,
कैसे जिंदगी के हाशीये हो गये ।।
तुम्हारे लिए  ही वक़्त उनके पास था,
आज वक़्त नहीं है उनके लिए,
घर घर नहीं बन पाएगा बिन माँ बाप के,
फिरता रहे बेरुखी के तिनके लिए।
ये ना भूलेंगे तुझे ता उम्र भर ,
भूल जाएंगे वो इनको भूला जिनके लिएll
कैसे छोड़ दोगे इनको उनके हाल पर,
भविष्य तेरा भी लिखा है दीवाल पर।
फिर क्या है मज़बूरी कैसा ईमान है,
मां बाप के साथ ही,इंन्सान क्यूं बेईमान है।
झूठी तरक्की के इस दौड़ में,
मतलबपरस्ती की घुड़ दौड़ में,
छूने की चाहत  में  क्यूं आसमान है।।
कमलेश,लानतें ज़रूर देगा ये ज़माना,
माँ बाप को भुलाना/रुलाना नही आसान  है।।

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-11-2017) को "श्रीमती इन्दिरा गांधी और अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई का 192वाँ जन्मदिवस" (चर्चा अंक 2792) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सही कहा