गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011 | By: kamlesh chander verma

ऋतु है सर्दी की ...!!!

ऋतु है सर्दी की उमंगों की गर्माहट जागी ,
चिपचिपाती गर्मी की सारी उलझन है भागी ,
मन के अवसाद कहीं दूर चले जाएँ अब तो ,
क्यूँ की मन ने निराशा की चादर है त्यागी ,
आने को है नई भोर जीवन की अब मेरे ,
उदासी रात बन के अँधेरे में है भागी ,
चाहो तो महसूस करो ,ना करो मुझको ,
मिली मुराद कहाँ सबको जो जिसने है मांगी ,
कमलेश' बदल ना सीख इस मौसम से कुछ ,
दुखो की घड़ी रह जाती है हिम्मत से आधी