गुरुवार, 14 जुलाई 2011 | By: kamlesh chander verma

चलो लिखो इक और ...मुंबई धमाकों का दर्द ....

चलो लिखो इक और दर्द ,दिल की किताब में ,
इक और पन्ना जुड़ गया ,नाकामी के हिसाब में ,

कितने रख रखें हैं ,सब्र के प्याले हम सबने ,
भरते ही नही ,रहते हैं खाली बे-हिसाब में ,

बरसों से पता है हम सबको जड़ ,इस नासूर की ,
दूर से चमकता है इनका पता, सतलुज-रावी-चिनाब में .

पर हम हैं ''शांति के पुजारी' सम्पूर्ण विश्व है जानता ,
तभी तो हम खोजते हैं ''शांति ''जरिये कातिल 'कसाब 'में ,

हम बन चुके हैं 'महाशक्ति ' इसका खुब गुमान कीजिये ,
पर ''कमलेश''निकलना पड़ेगा बे-शर्मी के हिजाब में ..


1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

टिप्पणी में यही कहूँगा कि-
" या इलाही ये माजरा क्या है?... "