शनिवार, 31 अक्तूबर 2009 | By: kamlesh chander verma

कौन कहता है कि दर्दे -दिल नही होता ?

कौन कहता है कि दर्दे -दिल नही होता ?


होता, तो ''दिल''दिल ही दिल में क्यूँ रोता


टपकते आँसू बिन आवाज के ,


उठती टीस गर दर्द होता ,।


इसको कुदरत का अजूबा कहें ,


या कहें और कुछ ?


चुभते हैं शूल अगर फूल काँटों में होता ,


कुछ भी नही दीखता इस ज़माने को,


दे जाते हैं इक तसल्ली इस दिल को ,


''वही होता है ''कमलेश'' ''जो मंजूरे खुदा होता ''


इस दर्द की शिद्दत का, जरा भी गुमान होता ,


तो उनकी यादों का बोझ हरगिज ढोता

1 comments:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

दर्द होता है जी

और दिल वालों को ही एहसास होता है दर्द का