सोमवार, 28 सितंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

दर्द में भी ये..!!!



दर्द में भी ये लब मुस्कुरा जाते हैं ,

बीते लम्हें हमें जब भी याद आते हैं , ।

चाँद लम्हात के वास्ते ही सही ,

मुस्कुराकर मिली थी मुझे जिंदगी , ।


तेरी आगोश में दिन थे मेरे कटे ,

तेरी बाहों में थी मेरी राते कटी

आज भी जब वो पल मुझको याद आते हैं ,

दिल से सारे गमो को भुला जाते हैं

दर्द में भी ये लब मुस्कुरा जाते हैं ,

बीते लम्हे हमें जब भी याद आते हैं , ।

मेरे काँधे पे सर को झुकाना तेरा ,

मेरे सीने में ख़ुद को छुपाना तेरा , ।

आके मेरी पनाहों में शामो सहर ,

कांच की तरह वो टूट जाना तेरा ,

आज भी जब मंजर नज़र आते है ,

दिल की विरानियो को मिटा जाते हैं

दर्द में भी ''कमलेश'' लब मुस्कुरा जाते हैं ,

बीते लम्हें हमें जब भी याद आते हैं ...

2 comments:

एकलव्य ने कहा…

ओह दर्द अभी भी बहुत कुछ है
बढ़िया रचना

Ashish Khandelwal ने कहा…

हैपी दशहरा.. हैपी ब्लॉगिंग