शनिवार, 15 अगस्त 2009 | By: kamlesh chander verma

वाह !! समीर भाई (उड़नतश्तरी) साहब ?क्या बात है !


आज के ज़मानेमें हमारे समीर भाई साहब जैसे कुछ ही आत्माएं इस धरती पर मिलेंगी ,जो इस काल के अनुरूपअपनी रचनाओं में अपनी कथा वास्तु का सिलेक्शन इस तरह करते हैं की अपने मन की वो बात्तें जिन्हें करने परजमाना कोई न कोई बेढंगा सा उप नाम दे सकता है ,लेकिन मजाल है जो समीर सर की रचना में कही भी कोई ऐसीवैसी बात आप पढ़ सके ,उल्टा मै उसी बात का समर्थक ,हो गया ,आज ही उनकी एक रचना'' कीजे संगत साधु की'' पढ़ रहा था तो मुझे लगा जो पढेगा ,तो उसे उसी के तरह लगने लगेगा ,उसमे पड़ोसी के बारे में जिस अंदाज से लिखाहैमान गए ,कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ इनके मन में आ रहा था .भईविदेश में रहने का फायदा भी है ,तो भाई लोगकुछ इस अंदाज में लिखने का प्रयास किया जाय, जिसमे समीर भाई साहब जैसी खुलापनहो ॥

1 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

आज नजर गई..इस अपार स्नेह का आभार!!