सोमवार, 8 सितंबर 2014 | By: kamlesh chander verma

कुछ भी नहीं था दिल में....!!!!

कुछ भी नहीं था दिल में ,इक़रार कर बैठे।
या  ख़ुदा किसी अज़नबी से ,प्यार कर बैठे।

उड़ते थे आसमां में ,पंछियों की तरह ,
ता-उम्र प्यार निभाने ,का इक़रार कर बैठे।

दूर तलक ना थी ,दुआ सलाम जिनसे ,
ऐसा क्या हुआ दिल में ,ऐतबार कर बैठे।

जो नज़रें उठी ना क़भी ,किसी अंज़ान की तरफ़ ,
थी क्या कशिश उसमें ,जो जां निशार कर बैठे।

दिलों में छुपा के रखती ,है दुनिया  इस अज़ाब को ,
''कमलेश'' क्यूँ फिर तुम खुद ,ही इज़हार कर बैठे।

2 comments:

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

उम्दा ग़ज़ल.।