मंगलवार, 6 दिसंबर 2011 | By: kamlesh chander verma

तेरी उल्फत के बिना जीना ...!!!

तेरी उल्फत के बिना जीना मंजूर नही ,
ना ही मेरी फितरत, ना है दस्तूर कहीं

धडकनें पूछती हर साँस लेने पर मुझसे ,
किसी के पास वो गिरवीं तो नही हैं कहीं ,

हो मय्यसर उनको ये जहाँ हो या वो जहाँ ,
जो तोड़ते हो दिल किसी का यहाँ या कहीं ,

आती जाती हवावों को भी देख लेते है ये
इतना भी नहीं उतरा तुम्हारा सरूर नहीं ,

चाहत की मजबूरियां नही मेरी इबादत थी ,
तुमपे हक़ जताना हक़
था मेरा गरूर नहीं ,

'कमलेश 'बिछी हैं नजर की चादर तेरी राहों में ,
निकलेगी उम्मीदों की किरन जरूर यहीं से कहीं




1 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

धडकनें पूछती हर साँस लेने पर मुझसे ,
किसी के पास वो गिरवीं तो नही हैं कहीं ,

Bahut Sunder