शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011 | By: kamlesh chander verma

किसी की सम्वेदना को ....!!!

किसी संवेदना को वेदना मत बनने दीजिये ,
नासूर बनने से पहले इसका उपचार कीजिये ।

कितना भी हो दर्द -ए-दिल बस मुस्कराइए ,
''कोई देना चाहे तकलीफ '' हंस के ले लीजिये ।

ठंडी हवाओं के झोकों में बिठा दूसरों को ,
आफतों की गर्म धारा में खुद खूब भीगिए।

वाह-वाह करते रहो जमाने में दूसरों की सदा ,
खुद अकेलेपन का हलाहल खुश हो के पीजिये ।

गर्म जोशी से मिलाओ सबसे हाथ खुलकर दोस्तों ,
फिर अपने हाथ की उँगलियों को फिरसे गिन लीजिये ।

'कमलेश'न करो कोई उम्मीद इस मतलबी दुनिया से ,
चाँद पर आशियाना बनाने का यत्न खुद ही कीजिये ॥

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

वाह-वाह करते रहो जमाने में दूसरों की सदा ,
खुद अकेलेपन का हलाहल खुश हो के पीजिये ।

Khoob Kaha...Bahut Badhiya

अनुपमा पाठक ने कहा…

उम्मीद करना ही दुःख का कारण होता है अक्सर...
ठीक सुझाया है आपने-
'कमलेश'न करो कोई उम्मीद इस मतलबी दुनिया से ,
चाँद पर आशियाना बनने का यत्न खुद ही कीजिये ॥