शनिवार, 26 जून 2010 | By: kamlesh chander verma

कितना दिल लगाने से पहले...!!!


कितना दिल लगाने से पहले, इत्मिनान किया मैंने ,
सच्ची है मुहब्बत 'का' फिर भी इम्तहान दिया मैंने ॥

कहने को तो मुहब्बत करना, गुनाह है इस जहाँ में ,
फिर भी करके मुहब्बत ,किया सबको हैरान मैंने ॥

हमारे इश्क की चर्चा है, शहर के ह़र मोड़ पर ,
इस तरह सारे शहर को, किया परेशान मैंने ॥

न छूटे दिल की लगी ,तेरी दिल-लगी में कहीं ,
कितना तेरे लिये दिल ,लगाना किया आशां मैंने ॥

तुझसे माँगा न कभी, तेरी चाहत के सिवा ,
तेरी चाहत की राहों में , सब किया कुर्बान मैंने ॥

न कभी तेरे जज्बात फिसले ना, फिसला दिल तेरा ,
इसी जज्बे का ''कमलेश '' अहसान खुद लिया मैंने ॥

3 comments:

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

मुहब्‍बत के जज्‍बे को सलाम. धन्‍यवाद कमलेश भाई.

anjana ने कहा…

बढ़िया रचना |