शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010 | By: kamlesh chander verma

मेरे प्यारे वतन ..!!

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मेरे अहले -वतन तू , ज्यादा उम्मीद कर ,
क्यूँ की तेरे ही गद्दार तुझे, बेचने पे तुले हैं !

जिन को दी थी चाबी ,सम्भालने को इस देश की ,
उनके इमानो के त्ताले, पहले ही खुले हैं !

पाक- दामन समझ, जिनको पूजती है दुनिया ,
अरे ।!! बाप ये सब आपस में घुले -मिले हैं !

जिस तेरे चमन में उडती थी चहचहाती चिड़ियाँ ,
अब जरा !गौर से देखो वहां , अब सांप पले हैं !

गौरो -फ़िक्र है ,तेरी तेरे बच्चों को, जान से ज्यादा ,
क्या करें 'कमलेश'तेरे ही कानून ने, लब सिले हैं !

जिन्होंने तोडना था तिलस्म, नापाक पड़ोसी का ,
पता चला ..!उनसे पहले ही ,उनके दिल
मिले हैं !!

3 comments:

M VERMA ने कहा…

जिस तेरे चमन में उडती थी चहचहाती चिड़ियाँ ,
अब जरा !गौर से देखो वहां ,सांप पले हुए हैं !
बहुत खूब

दिलीप ने कहा…

bahut hi vicharottejak rachna...desh ki avyavasthaon pe gehri chot karti sundar rachna...

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया!