गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009 | By: kamlesh chander verma

क्यूँ नही लगता ये..!!!


क्यूँ नही लगता ये जहाँ मेरा है ,

उम्मीद नहीं दिखती बस उदासियों का घेरा है


रिश्तों नातों में क्या ?है , वो कशिश बाकी !

हक जता के कहें कोई ,मेरा है बस मेरा है ,


धुंधली हुई जाती हैं ,उजालों की परछाई ,

ख़ुद उजालों के घर ,घना अँधेरा है ,


जहाँ
जिन्दगी खिल -खिलाती थी, ख़ुद जिन्दगी से ,

उस जिन्दगी के घर , बे -वक्त मौत का डेरा है


''कमलेश '' कर नजर इस और तिरछी ,

उधर मेरे हमदर्द ,दोस्तों का बसेरा है

2 comments:

परमजीत बाली ने कहा…

बढिया रचना है।बधाई।

Udan Tashtari ने कहा…

हाँ जिन्दगी खिल -खिलाती थी, ख़ुद जिन्दगी से ,
उस जिन्दगी के घर , बे -वक्त मौत का डेरा है ।

-वाह!! बहुत उम्दा!!