शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012 | By: kamlesh chander verma

खुदगर्ज़ ज़माने की जब , वो सुनी दास्ताँ ,.......!!!

खुदगर्ज़ ज़माने की जब , वो सुनी दास्ताँ ,
वह खुद को  ही लगी , ये अपनी ही दास्ताँ .....

बेदर्दी से तोड़े  डाले किस्मत, ने सपने मेरे ,
वक्त के साथ शामिल थे,खुद इसमें  अपने मेरे .

उन भावों को दी जुबां  ,हमने अपने अंदाज़ में ,
वो सुन सकें न था इतना, दम मेरी आवाज़ में .

 हर दम रहा मन तडफता, अपने  अपनों के लिए ,
पूरी जिंदगी लग गयी, जिनके अधूरे  सपनों के लिए .

बिना कसूर कत्ल कर दो ,ये कोई इन्साफ नही है ,
फिर क्यूँ मिले सज़ा ,जिसका कोई हिसाब नही है .

उपवन की  बेलों ने सहारे को, खुद ही खा लिया ,
पर  रहीं रीती की रीती समझी,  सब कुछ पा  लिया .

अरे ''कमलेश''कौन समझाये, इन भ्रष्ट -मती बन्दों को ,
जिनको हो आदत बोझों की ,सहारे की ज़रुरत क्या कंधों को  ..........}{

1 comments:

DINESH PAREEK ने कहा…

बहुत खूब

मेरी नई रचना पर जरुर नजर रखें
खूब पहचानती हूँ मैं तुम को
http://dineshpareek19.blogspot.in/