गुरुवार, 20 दिसंबर 2012 | By: kamlesh chander verma

उल्झन यही है मन की .......!!!

 उल्झन  यही है मन की ,उलझन  सुलझती ही नही ,
 गर सुलझना ही होता ,नजर उनसे उलझती ही नही ......}{

  देखने में सब कुछ  मानिन्दे-वक्त  था हर तरफ ,
  गर न होती चिंगारी तो आग  सुलगती ही नही .

  गर वक्त ने ना   नोचे  होते पंख  उसके इस कद्र ,

  परवाज़े -मंजिल तक पहुँच जाती तो बिलखती ही नही ' 

  पता था  मुहब्बत का  दुश्मन है  जब की ज़माना ,

  फिर भी इसके  जूनूने -ख़ुमारी सर से उतरती ही नही .

   वक्त के तूफानों ने कई बार उजाड़ा आशियाने को मेरे ,

   आपसी  रिश्तों की   मजबूत डोरी  है कि टूटती ही नही .

   ''कमलेश''कोशिश बहुत की शक्लो-सूरत बदलने की ,

    मगर इन उलझनों के रहते खुद की शक्ल निखरती नही ........[]\

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया!
यह उलझन तो सभी के साथ है!

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

वक्त के तूफानों ने कई बार उजाड़ा आशियाने को मेरे ,
आपसी रिश्तों की मजबूत डोरी है कि टूटती ही नही .

रिश्तों की डोर यूँ ही बंधी रहें :)