बुधवार, 16 नवंबर 2011 | By: kamlesh chander verma

हसरत मिटी ना दिल की !!!


हसरत मिटी ना दिल की ,इक बार तुमसे मिल के ,
ना कह सके ये लब , अरमां जो थे दिल के

आँखों में थी जुस्तजू,तुमसे नजरें मिलाने की ,
बस बेबस रही ये आँखें ,रह गयी पलकें बस हिल के

अब भी बचा शरारत भरा ,आँखों में अक्श दिल का ,
दिल देखता है उनको ,आँखों के पासे बदल -बदल के

होठों की सुर्ख धारें भी ,रही होंगीं वहां मगर ,
आँखें देखती रही चेहरा ,खुद ही मचल -मचल के

मिलने की हर सूरत ,बना देगी कायनात ज़रूर ,
किस्मत लाएगी तुमको ,मेरी राह में खुद चल के

अरे
!तुम और मेरी रह-गुजर में ,यकीं नहीं होता ,
'
कमलेश' गया है दिल ,बाहर पिघल-पिघल के

3 comments:

S.N SHUKLA ने कहा…

मिलने की हर सूरत ,बना देगी कायनात ज़रूर ,
किस्मत लाएगी तुमको ,मेरी राह में खुद चल के ॥

सुन्दर रचना , बधाई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर सृजन!

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुंदर!