शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010 | By: kamlesh chander verma

खुद-गर्ज़ जमाना ....!!!

देखो? इन्सान कितना खुद- गर्ज़ हो गया ,
खून के रिश्ते निभाना भी, इक कर्ज़ हो गया

जिन्दगी भर उठाये रखा ,जिनको सीने पर ,
वही अहसास -अपनों का ,मर्ज़ हो गया

आज महसूस हुई जब, जरूरत उनकी ,
उनका पल भर का आना , अदा-फर्ज़ हो गया

क्यों ?बेरुखी करते है ,जमाने के लोग ,
वाकया खूने-दिल -स्याही से, दर्ज़ हो गया

मामूली खरोंच पर जिनकी, मेरी निकल जाती थी आह !
''कमलेश''वही खून आज, सर्द हो गया

3 comments:

sangeeta swarup ने कहा…

कड़वी सच्चाई को बताती गज़ल बहुत अच्छी लगी...बधाई

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वर्मा जी शुक्रिया ! मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और अपनी टिपण्णी छोड़ने के लिए !
आपकी ये ग़ज़ल भी अतिशय सुन्दर है ...और मतला बहुत अच्छा है ... बधाई !
देखो? इन्सान कितना खुद- गर्ज़ हो गया ,
खून के रिश्ते निभाना भी, इक कर्ज़ हो गया ।

कलयुग में रिश्ते नाते अब रहे कहाँ ... बस खुदगर्जी ही रह गयी है !

Kulwant Happy ने कहा…

अद्भुत। अद्बुत।