रविवार, 9 मार्च 2014 | By: kamlesh chander verma

मेरे आशियाने की...!!

मेरे आशियाने की ईंटें ,क्यूँ उखड़ रही हैं,
जतन से सम्भाला , फिर भी बिखर रही हैं।

वक्त है बेरहम या ,मेरी किस्मत का खेल है
है बहारे गुलशन ,क्यारी नही निखर रही है।

किस पर  करें यकीं ,किस पर हमको नाज़ हो
फ़ितरत जो थी जिनकी ,हरदम उधर रही है।

मतलब परस्त दुनिया में ,रिश्तों का मोल क्या,
फिरी हुई नजर  कभी, किसी की  इधर रही है।

*कमलेश*बंट गयी जिंदगी ,दुनिया के आज़ाब में '
अब तो ये न इधर की  ,न उधर की रही है।।

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मित्रों।
तीन दिनों तक देहरादून प्रवास पर रहा। आज फिर से अपने काम पर लौट आया हूँ।
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आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (09-03-2014) को आप रहे नित छेड़, छोड़ता भाई मोटा ; चर्चा मंच 1546 पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

Sunder Panktiyan

Vaanbhatt ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल...