गुरुवार, 25 अगस्त 2011 | By: kamlesh chander verma

छोडो अन्ना जी इस देश को !!! बुखारी के बयान के बाद .....

छोडो !अन्ना जी, इस देश को इसके हाल पर ,
हिन्दू-मुस्लिम का टीका, लगा दिया भाल पर ,

'भूखे रहने ' में भी लगाते हैं ,मजहब का चश्मा ,
सरे आम तमाचा है, इक जुटता के गाल पर

ये भ्रष्टाचार का नासूर ,कोई आज से नही ,
वो [बुखारी] खुद क्यूँ नही ,उलझे इस सवाल पर

संकुचित सोच खतरनाक है, भ्रष्टाचार से बड़ी ,
खुदा दे उनको अक्ल ! उनके उस ख्याल पर

अब दुनिया को दिखता है बस अन्ना का आइना ,
शायद गयी नही नजर इनकी ,भावनाओं के उबाल पर ,

अब उठो निकलो मजहबों की दीवारों से बाहर ,
'कमलेश'ना रखो भ्रष्टाचार को ,धर्म की दीवार पर



1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपने इस समसामयिक रचना में हकीकत बयान कर दी है।