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रविवार, 12 मई 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

तुमसे मिले जब हम.....!!!

तुमसे मिले जब हम ,मन मचल गया ,
पकड़ा था दोनों हाथ में ,फिर भी फ़िसल  गया। 

कहने को हमको कोई, फर्क नही पड़ता ,
पर तेरे रूप के जलवों से ,ईमान हिल गया। 

रातों की गयी नींद ,मन का चैन छीन गया ,
मै तो हुआ तेरा ,साथ' मेरा दिल भी गया।

आज़ाद कर अपनी कैद से ,या दे-दे सज़ा ,
 उड़ने को तेरे प्यार का, आसमां  मिल गया।

जिनको नही है 'इल्म' ,मुहब्बत की गहराई का,
दे दी किसी ने जान , तब ज़माना हिल गया। 

''कमलेश''ऐसे ही 'शमां ' परवानो से नही मिलती ,
हद थी 'इश्क' की ,उसी की लौ में जल  गया।।
बुधवार, 17 अप्रैल 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

''नफरत है''...!!!

''नफरत है'' मुझसे जताना ,उनका इक बहाना था ,
छुड़ा कर मेरा पहलू,बेगाने आगोश में जाना था .


कल तक जिनको मेरे बगैर, जीना था ,मुश्किल.
नही ज़रुरत है ' उस गोली का मै ही निशाना था.

न बनाते ख्वाबों की मंजिलें, मुस्तकबिल के मुहाने पर ,.
क्यों करते यूँ ही जाया .,जो वक्त मेरा सुहाना था।

इम्तिहानों के दौर चले कितने ,तुझको पाने के वास्ते , 

वो थी तेरी चाहत ,या महज़ फ़साना था। .

'कमलेश ' की है दरिया दिली ,या उनकी बदनीयत ,
अब ही टूटना अच्छा ,जिसने इक दिन टूट जाना था..
सोमवार, 15 अक्टूबर 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जन सरोकारों की अनदेखी सरकारों का...!!!

जन सरोकारों की अनदेखी सरकारों का  फैशन हो गया ,
जन आंदोलनों को दबाना सरकारों का पैशन हो गया। 

दमनकारी नीतियों से कोई जन तन्त्र चलता नही ,
 जनआक्रोश  कुचलने से गण -तन्त्र  फूलता फलता नही. 

आप उनकी भी सुनो जिन्होंने तुमको  अपना नेता चुना है ,
पर अफ़सोस आपने इनको ही फंसाने  का फंदा बुना है। 

अब शायद नही चल पाएंगे  राजनीती के उलटे पांसे ,
होश में आओ कहीं आना न पड़े वापस वहाँ [संसद] से। 

जो हक है आम आवाम का आप उसका  उसको दीजिये ,
करके गहन समीक्षा सबकी  फिर मंत्रिमंडल में लीजिये. 

भडकाओ न जज्बातों की दिलों में जो छुपी आग है ,
क्यों की वर्तमान राजनीती की चादर में दाग ही दाग है। 

'कमलेश'राजनीति का खेल अब इक  प्रहसन हो गया है ,
जन सरोकारों की अनदेखी सरकारों का फैशन हो गया।।
बुधवार, 12 सितंबर 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

कैसा है विद्रूप रूप अभिव्यक्ति की आज़ादी ..

कैसा है विद्रूप रूप अभिव्यक्ति की, आज़ादी का  ,
कहीं षड्यंत्र तो नही है ये  ,अधिकारों की बर्बादी का। 

प्रजातंत्र के नाम को लेकर, ये क्या-2  करते हैं ,
अपनी तिजोरियां भरते हैं ,आम-जन भूखो मरते हैं। 

मन की पीड़ा के निरूपण को जब , कलम-कूची की धार  चली ,
 लोक-तन्त्र की  दे दुहाई उन पर ही , कानूनी  तलवार चली। 

पर जिनके मन है प्रेम-विक्षोभ  उनको,इनकी  परवाह  नही ,
होने को महिमामंडित ;राजतन्त्र' से, उनको कोई चाह  नही। 

सारा देश जगाने को वो ,  अग्नि-पथ पर चलते जाते हैं ,
 कोई कविता की रचना करते हैं ,कोई ;कार्टून 'बनाते हैं।

' ये  क्यों नही समझते ;कमलेश' इनके मन का  मर्म नही ,
जो ली है जिम्मेदारी निभाने की ,क्या? ये इनका धर्म नही।।

शुक्रवार, 25 जून 2010 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

मेरी जिन्दगी में इतने...!!!


मेरी जिन्दगी में इतने झमेले ना होते
गर तुम मेरे जज्बातों से खेले ना होते ,


बहुत पर खुशनुमा थी मेरी यह जिन्दगी
गर दिखाए हसीं- ख्वाबों के मेले होते ,


रफ्ता-रफ्ता चल रहा था कारवां जिन्दगी का
दुनिया की इस महफिल में हम अकेले होते ,


''कमलेश'' ना लुटता दिले- सकूं मेरा कभी
गर मेरी नजरों के सामने ,तेरे हाथ पीले ना होते
,


हमेशा ही कहर बरपा है इश्क पर जमाने का
राहें फूलों की होती कांटे भी नुकीले होते