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बुधवार, 12 सितंबर 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

कैसा है विद्रूप रूप अभिव्यक्ति की आज़ादी ..

कैसा है विद्रूप रूप अभिव्यक्ति की, आज़ादी का  ,
कहीं षड्यंत्र तो नही है ये  ,अधिकारों की बर्बादी का। 

प्रजातंत्र के नाम को लेकर, ये क्या-2  करते हैं ,
अपनी तिजोरियां भरते हैं ,आम-जन भूखो मरते हैं। 

मन की पीड़ा के निरूपण को जब , कलम-कूची की धार  चली ,
 लोक-तन्त्र की  दे दुहाई उन पर ही , कानूनी  तलवार चली। 

पर जिनके मन है प्रेम-विक्षोभ  उनको,इनकी  परवाह  नही ,
होने को महिमामंडित ;राजतन्त्र' से, उनको कोई चाह  नही। 

सारा देश जगाने को वो ,  अग्नि-पथ पर चलते जाते हैं ,
 कोई कविता की रचना करते हैं ,कोई ;कार्टून 'बनाते हैं।

' ये  क्यों नही समझते ;कमलेश' इनके मन का  मर्म नही ,
जो ली है जिम्मेदारी निभाने की ,क्या? ये इनका धर्म नही।।

सोमवार, 9 जनवरी 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्या ? ईमानदारी की .....कीमत चुकानी पड़ेगी !!!

क्या ? ईमानदारी को कीमत चुकानी पड़ेगी ,
झूठ से सच को मुहं की खानी पड़ेगी

इतनी धुंध छाई है झूठ की हर तरफ ,
सच्चाई को अपनी परछाई छुपानी पड़ेगी

जब हम बोलते हैं की सच है यही ,
उस सच की भी सच्चाई बतानी पड़ेगी

सौ बार कहने पर बन जाता है ''बछड़ा -मेमना ,
मतलब साख सच्चाई को भी गंवानी पड़ेगी

तलवार की धार बन कर रह गयी है सच्चाई ,
गर चलना है तो पैरों की चमड़ी कटानी पड़ेगी

मायूसी भरी रात में भी उम्मीदों के चिराग जलते हैं ,
क़ुरबानी के मोम से सच्चाई की लौ जलानी पड़ेगी

पतंगों के माफिक जान देकर शमां के लिये ,
बुझती हुई शमां को मशाल बनानी पड़ेगी

''कमलेश''जीत होती हमेशा रही है सत्य की ,
झूठ पर यही जीत भविष्य की निशानी बनेगी