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रविवार, 12 मई 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

तुमसे मिले जब हम.....!!!

तुमसे मिले जब हम ,मन मचल गया ,
पकड़ा था दोनों हाथ में ,फिर भी फ़िसल  गया। 

कहने को हमको कोई, फर्क नही पड़ता ,
पर तेरे रूप के जलवों से ,ईमान हिल गया। 

रातों की गयी नींद ,मन का चैन छीन गया ,
मै तो हुआ तेरा ,साथ' मेरा दिल भी गया।

आज़ाद कर अपनी कैद से ,या दे-दे सज़ा ,
 उड़ने को तेरे प्यार का, आसमां  मिल गया।

जिनको नही है 'इल्म' ,मुहब्बत की गहराई का,
दे दी किसी ने जान , तब ज़माना हिल गया। 

''कमलेश''ऐसे ही 'शमां ' परवानो से नही मिलती ,
हद थी 'इश्क' की ,उसी की लौ में जल  गया।।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्यूँ नही लगता ये..!!!


क्यूँ नही लगता ये जहाँ मेरा है ,

उम्मीद नहीं दिखती बस उदासियों का घेरा है


रिश्तों नातों में क्या ?है , वो कशिश बाकी !

हक जता के कहें कोई ,मेरा है बस मेरा है ,


धुंधली हुई जाती हैं ,उजालों की परछाई ,

ख़ुद उजालों के घर ,घना अँधेरा है ,


जहाँ
जिन्दगी खिल -खिलाती थी, ख़ुद जिन्दगी से ,

उस जिन्दगी के घर , बे -वक्त मौत का डेरा है


''कमलेश '' कर नजर इस और तिरछी ,

उधर मेरे हमदर्द ,दोस्तों का बसेरा है