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गुरुवार, 22 अप्रैल 2010 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जलन -यह -कैसी -जलन ..!!!

  • थी चांदनी तारों के आगोश में ,देख!चाँद जल गया !
  • जलन भी थी इतनी तेज, सूरज भी पिघल गया !

  • तपिस तेरे मेरे प्यार की, पहुंच गयी कूंचों तक !
  • बारास्ता जो भी गुजरा इधर से ,वो भी मचल गया !

  • ऐसा नही की विरानियाँ ही हैं, इस राहे-गुजर में ,
  • जो भी आया दर-ए-इश्क में ,गाता ग़ज़ल गया !

  • यहाँ इतनी आसां नही होती ,राहें चाहत की ,
  • कुछ तो सीधे चलते चले गये ,कोई फिसल गया !

  • 'कमलेश'शुक्रिया कैसे अदा करुँ मै उसका ,
  • जिसके प्यार के सहारे ,आखिर सम्भल गया !!