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बुधवार, 15 मई 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्यों पंछी हुआ उदास...!!! पलायन का दर्द ?..

क्यों पंछी हुआ उदास ,अपना नीड़ छोड़ कर ,
जिसे  संजोया था ,तिनका -तिनका जोड़ कर। 

न किया गिला किसी से ,न शिकायत किसी की ,
चुप-चाप उड़ चला वो ,अपनी पीड़ ओढ़कर। 

मुड़ के देखा तो था , पड़ा बिखरा हुआ अतीत ,
पर जा रहा था वो,कुछ सच्चे रिश्ते तोड़ कर। 

खट्टी-मीठी यादे चल रहीं थी ,चलचित्र की तरह ,
दिल करता था  देखता रहे, चित्रों को जोड़ कर। 

टीस सी उठ रही है दिल में , उस  दर  को छोड़ते ,
है! इल्तिजा वक्त से ,ले आये वो  ''वक्त'' मोड़ कर।

'कमलेश'कहते हैं ये सब ,किश्मत का रचा खेल है ,
कभी कौन ? शौक से गया है ,अपना ''नीड़ ''छोड़ कर।।


शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

हम कब के मर गये थे ...!!!


हम कब के मरगये थे तेरे प्यार मे ,
अदायगी
रसमे -जनाज़ा तो है ज़माने की,

पता चल गया होता बहुत पहले,
पर
तूने कसम दी थी ना बताने की ,,

बन गयी थी जिंदगी एक बेजान बुत जब हमने ,
आहट
सुनी थी किसे बेगाने की,,

जिंदगी
हो गयी थी मौत पर भारी ,
जब
आया था वक़्त ,प्यार मे मिट जाने की,,

जिंदगी देख कर मरी फिर एक बार ,
जब तेरी बेताबी दिखी परायी बाहों मे सिमट जाने की ,,

'
कमलेश' मैने खुद ही मूंद ली आँखें , क्यूँ की ,
तुमने कर दी थी तैयारी मेरे मर जाने की,,