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गुरुवार, 23 अगस्त 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

लगते हैं बेचारे हम ....!!!

 
हम चाहे तो आसमान को, टुकड़ों में तोड़ दें ,
 सागरों के मुहाने को, जिधर चाहे मोड़ दें

रौशनी की मोड़ देते हैं राह , उसकी ही राह में , 
बिजलियों को कैद कर दें ,उन्ही की सैरगाह में

मजाल है कोई चला जाये , हमारे मुहं पर बोलकर , 
सिंहों के भी दांत गिने हैं ,हमने मुहं खोलकर

फिर दुनिया को क्यों नही ,लोहा मनवा पाते हैं , 
नर्म ,अस्थिर ,धर्म-विभाजित 'राष्ट्र'क्यों कहलाते हैं ?

अब नवयुवकों को बदलना होगा , इस सड़े निजाम को,
'
कमलेश'अब निश्चय कर करो ,देश के इस काम को


मंगलवार, 4 मई 2010 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

सम्वेदनाओं के शून्य...!!!


सम्वेदनाओं के शून्य को ,जगाना चाहता हूँ !
विचारो के उत्तेज से ,हलचल मचाना चाहता हूँ !

मर्म को पहचान, चोट करारी होनी चाहिए ,
बंद आँखों को नींद से ,जगाना चाहता हूँ !

खून की गर्म धारा ,बह रही ही जिस्म में ,
देश-भक्ति का इसमें ,उबाल लाना चाहता हूँ !

जज्बों में ना कमी हो तो ,समन्दर भी छोटा है ,
,आसमां में अपना तिरंगा फहराना चाहता हूँ !

कमी नही इस देश में, बौद्धिक शारीरिक बल की ,
'कमलेश' इसे विश्व शीर्ष पर पहुंचाना चाहता हूँ !!