शुक्रवार, 25 सितंबर 2009 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

कौन सी वो बात थी?













कौन सी वो बात थी?जो बताई ना गयी ,
कोशिशें लाख हुईपर छिपाई न गयी ।

गर रख पाते !!पर्देदारी अपनी मुहब्बत की ,
ये रस्म भी उनसे जरा भी निभाई न गयी ।

रस्में -महब्बत हौसले ,का काम है ,
दीवारे-दुनिया हमसे, गिराई न गयी ,

दुनिया ख़ुद- ब -ख़ुद मान लेती ,मेरी चाहत को ,
पर''कमलेश'' कुरबाने -मुहब्बत ,दिखायी न गयी ॥

3 comments:

sandeep sharma ने कहा…

bahut khoob...

समय चक्र ने कहा…

वर्माजी
बहुत ही भावपूर्ण रचना .

Ashish Khandelwal ने कहा…

अच्छी कविता..
हैपी ब्लॉगिंग