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कमलेश वर्मा
जिन्दगी क्यों बनी,दुश्मन जिन्दगी की ,

उसी ने दी बददुवा , जिसकी बंदगी की


काश ; समझ पाते फितरत उसकी ,

लिख लेते इबारत चेहरे पर, पसंदगी की


था अकेला तो भी खुश था ,

किसी ने दे दी कसम, पूरी जिंदगी की


जीते जी मर गये ''कमलेश '' हम तभी ,

जब निकली कातिल जिन्दगी, ख़ुद जिन्दगी की
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2 Responses
  1. अरे वाह, आपने जिंदगी को बहुत सुंदर ढंग से बयां किया है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }


  2. बढ़िया है, बधाई.


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